रविवार, 9 सितंबर 2012
सिंधू घाटी सभ्यता
सिंधू घाटी सभ्यता
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बीसवीं
सदी के शुरूआत तक इतिहासवेताओं की यह धारणा थी कि वैदिक सभ्यता भारत की प्राचीनतम
सभ्यता है। लेकिन बीसवीं सदी के तीसरे दशक में खोजे गए स्थलों से साबित होता है कि
वैदिक सभ्यता से पूर्व भी भारत में एक अन्य सभ्यता विद्यमान थी।
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इसे
हड़प्पा सभ्यता या सिंन्धू घाटी सभ्यता के नाम से जाना जाता है क्योंकि इसक प्रथम
अवशेष हड़प्पा नामक स्थान से प्राप्त हुए थे। तथा आरम्भिक स्थलों में से अधिकांश
सिंधू नदी के किनारे अवस्थित थे।
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सिंधू
घाटी सभ्यता की विस्तार अवधि 2500-1750 ई0पू0 थी।
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सर्वप्रथम
1921ई0 में रायबहादूर दयाराम साहनी ने हड़प्पा नामक स्थान
पर इसके अवशेष खोजे।
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इस
सभ्यता का विस्तार पंजाब, सिंध,
ब्लूचिस्तान, गुजरात, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर
और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक था।
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उत्तर
में मांदा (जम्मू), दक्षिण में नर्मदा का मुहाना, पश्चिम
में मकरान समुद्र तट(ब्लूचिस्तान),
उत्तर-पूर्व में मेरठ
(उत्तर-प्रदेश) और पूर्व में आलमगीरपुर इस सभ्यता की चौहद्दी थी।
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सिंधू
सभ्यता का आकार त्रिभुजाकार था तथा इसका क्षेत्रफल 12,99,600 वर्ग
किमी था।
सिंधू सभ्यता के महत्वपूर्ण उत्खनन स्थलः-
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क्र. सं.
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स्थल का नाम
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उत्खनन वर्ष
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निर्देशन
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1.
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हड़प्पा (मांटमोगरी, पाकिस्तान)
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1921 ई0
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दयाराम साहनी
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2.
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मोहनजोदड़ो (सिंध का लरकाना, पाकिस्तान)
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1922 ई0
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राखलदास बनर्जी
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3.
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सुत्कांगडोर (ब्लूचिस्तान, पाकिस्तान)
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1927 ई0
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ऑरेल स्टाइन
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4.
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चन्हूदड़ो (सिंध, पाकिस्तान)
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1931 ई0
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एम0
जी0
मजूमदार
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5.
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रंगपुर (अहमदाबाद, काठियावाड़, गुजरात)
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1951-53 ई0
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माधोस्वरूप वत्स, बी0बी0 लाल, एस0 आर0 राव
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6.
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कोटदीजी (सिंध पाकिस्तान)
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1953 ई0
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फजल अहमद
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7.
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रोपड़ (पंजाब)
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1953 ई0
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यज्ञदत्त शर्मा
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8.
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लोथल ( अहमदाबाद, काठियावाड़, गुजरात )
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1954 ई0
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एस0
आर0
राव
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9.
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आलमगीरपुर (मेरठ, उत्तर प्रदेश)
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1958 ई0
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यज्ञदत्त शर्मा
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10.
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कालीबंगा (हनुमानगढ़, राजस्थान)
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1961 ई0
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बी0बी0 लाल
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11.
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सुरकोटड़ा (कच्छ, गुजरात)
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1972 ई0
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जगपति जोशी
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12.
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बनवाली (हिसार, हरियाणा)
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1973 ई0
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आर0
एस0
बिष्ट
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13.
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धौलावीरा (कच्छ, गुजरात)
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1990 ई0
|
आर0
एस0
बिष्ट
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नगर-योजना
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इस
सभ्यता की महत्वपूर्ण विशेषता नगर योजना थी।
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नगरों
में सड़कें व मकान विधिवत् बनाये गये थे। मकान पक्की ईन्टों से बने होते थे तथा
सड़के सीधी होती थी।
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प्रत्येक
सड़क और गली क दोनो ओर पक्की नालियां बनायी गई थी, नालियां पक्की व ढ़की हुई
थी।
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सिंधू
सभ्यता की ईन्टों की विशेषता यह थी कि उन पर किसी प्रकार का चित्र नहीं मिलता है।
कुछ कच्ची इन्टों पर कुत्तों और कौवों के पंजों के निशान मिलते है।
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स्नानागार
प्रायः मकान के उस भाग में बनाये जाते थे,
जो सड़क अथवा गली के निकटतम होते
थे।
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मोहनजोदड़ो
में एक विशाल स्नानागार मिला है जिसका उपयोग आनुष्ठानिक स्नान के लिए होता था।
नगर प्रायः दो भागों में बंटे
होते थे- उपरी भाग अथवा सिटेडल तथा निचला भाग। सिटेडल में जन-इमारतें, खाद्य-भण्डार
गृह, धार्मिक इमारतें थी तथा निचले भाग में लोग रहा करते थे।
लेखन-कला
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दुर्भाग्यवश, अभी
तक सिंधू घाटी सभ्यता की लिपि को पढ़ा नहीं जा सका है । इसमे चित्र और अक्षर ( लगभग
400 अक्षर एवं 600 चित्र) दोनों ही ज्ञात होते थे।
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यह
लिपि प्रथम लाईन में दांए से बांए तथा
द्वितीय लाईन में बांए से दांए लिखी गई है।
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लिपि
का यह तरीका ''बाउस्ट्रोफिडन'' ¼Boustrophedon½ कहलाता है।
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